spritual

Mokshada Ekadashi 2022 : दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा !

जिस कारण उनके पिता के कष्ट दूर हुये और उन्होंने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया. इस प्रकार इस व्रत के पालन से पितरो के कष्टों का निवारण होता हैं.

PUBLISHED BY – LISHA DHIGE

हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है और मार्गशीर्ष मास में आने वाली एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहते हैं. इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस वर्ष मोक्षदा एकादशी का व्रत 3 दिसंबर 2022 दिन शनिवार को रखा जाएगा। कहा जाता है कि अगर आप जन्म मरण के बंधन से मुक्ति पाना चाहते हैं तो आपको मोक्षदा एकादशी का व्रत जरूर रखना चाहिए. अगर आप व्रत कर रहे हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद व्रत कथा का पाठ जरूर करें। क्योंकि व्रत कथा के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

चंपा नगरी में एक प्रतापी राजा वैखानस रहा करते थे. उन्हें सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान था. बहुत प्रतापी एवम धार्मिक राजा थे. इसी कारण प्रजा में भी खुशहाली थी. कई प्रकंड ब्राह्मण उसके राज्य में निवास करते थे. एक दिन राजा ने एक सपना देखा, जिसमें उनके पिता नरक की यातनाएं झेलते दिखाई दिए. ऐसा सपना देखकर राजा बैचेन हो उठे. सुबह होते ही उन्होंने सपने की बात अपनी पत्नी से बताई. राजा ने यह भी कहा इस दुःख के कारण मेरा चित्त कहीं नहीं लग रहा. क्योंकि वे इस धरती पर संपूर्ण ऐशो आराम से हैं और उनके पिता कष्ट में हैं. पत्नी ने कहा कि महाराज आपको आश्रम में जाना चाहिये.

राजा आश्रम गए. वहाँ कई सिद्ध गुरु थे, सभी अपनी तपस्या में लीन थे. महाराज पर्वत मुनि के पास गए उन्हें प्रणाम किया और समीप बैठ गए. पर्वत मुनि ने मुस्कुराकर आने का कारण पूछा. राजा अत्यंत दुखी थे उनकी आंखों से अश्रु की धार लग गई. तब पर्वत मुनि ने अपनी दिव्य दृष्टी से सम्पूर्ण सत्य देखा और राजा के सर पर हाथ रखा और यह भी कहा तुम एक पुण्य आत्मा हो, जो अपने पिता के दुःख से इतने दुखी हो. तुम्हारे पिता को उनके कर्मो का फल मिल रहा हैं. उन्होंने तुम्हारी माता को तुम्हारी सौतेली माता के कारण बहुत यातनाएं दी.

इसी कारण वे इस पाप के भागी बने और नरक भोग रहे हैं. राजा ने पर्वत मुनि से इस दुविधा के हल पूछा इस पर मुनि ने उन्हें मोक्षदा एकादशी व्रत पालन करने एवम इसका फल अपने पिता को देने का कहा. राजा ने विधि पूर्वक अपने कुटुंब के साथ व्रत का पालन किया और अपने पिता को इस व्रत का फल अपने पिता के नाम से छोड़ दिया, जिस कारण उनके पिता के कष्ट दूर हुये और उन्होंने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया. इस प्रकार इस व्रत के पालन से पितरो के कष्टों का निवारण होता हैं.

bulandmedia

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button