छत्तीसगढ़

‘जनसम्पर्क’ का अंधेरा: विज्ञापन अब ‘इनाम’ नहीं, ‘हथियार’ है!

मनोज पाण्डेय
कभी यह विभाग जनसम्पर्क कहलाता था – जनता और सरकार के बीच पुल बनने का प्रतीक। आज वही पुल चरमरा रहा है, दीवारों में दरारें हैं, और उस पार बैठे हुक्मरान तक जनता की आवाज़ पहुँचने से पहले ही किसी की कुर्सी की मर्ज़ी में दम तोड़ देती है।
छत्तीसगढ़ का जनसम्पर्क विभाग इन दिनों एक नाजुक दौर में नहीं, एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ सत्य और सुविधा के बीच सीधा युद्ध छिड़ चुका है।
कभी संवाद के लिए बने इस भवन में अब “संवाद” नहीं, “सहमति” मांगी जाती है।
यहाँ सवाल पूछना गुनाह है, और चुप रहना सबसे बड़ी योग्यता।
कभी विज्ञापन पत्रकारिता का आधार नहीं, उसका ईंधन हुआ करते थे, एक माध्यम जिससे शासन जनता से संवाद करता था। पर आज विज्ञापन विचारों को बांधने का हथियार बन गए हैं।


कौन लिखेगा, कौन बोलेगा, कौन चुप रहेगा – यह अब ख़बर नहीं, “कॉन्ट्रैक्ट” तय करते हैं।
जिन मीडिया संस्थानों ने सवाल किए, उनके विज्ञापन बंद कर दिए गए।
जिन्होंने मुस्कराकर प्रणाम किया, उनके खाते में प्रसन्नता जमा हो गई।
यह प्रचार का बाजार नहीं, जनता के विश्वास का सौदा है।
और अफसोस की बात यह है कि यह सब उस विभाग में हो रहा है जिसका नाम “जनसम्पर्क” है – यानी जनता से सम्पर्क!
पर अब लगता है, जनता तो कहीं दूर रह गई है; सम्पर्क अब बस “चहेतों” से रह गया है।
विभाग में अनुशासन कभी उसकी आत्मा था। एक प्रणाली थी जो तय करती थी कि सरकार की आवाज़ निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से जनता तक पहुँचे।
अब वह आत्मा कहीं खो गई है।
नीतियाँ फाइलों में हैं, पर फ़ैसले टेबल के इशारों से तय होते हैं।
चहेतों की चकल्लस चलती है, और ईमानदार अफसरों की आवाज़ खामोश रहती है।
यह वही विभाग है जहाँ कभी कहा जाता था –
“हम जनता की आँख बनेंगे।”
आज वही आँखें बंद हैं, ताकि व्यवस्था की गलियों का अंधेरा दिखाई न दे।
पत्रकारों/संपादकों का उत्पीड़न अब आम है।
जब कोई पत्रकार सवाल पूछता है, तो वह शासन का विरोध नहीं, शासन का आइना दिखाता है। पर अब यह आइना कई लोगों को असहज करने लगा है।
विज्ञापन रोक देना, पोर्टल बंद करवा देना, रिपोर्टर को “ब्लैकलिस्ट” कर देना – यह लोकतंत्र का चेहरा नहीं, उसकी चुप्पी का चेहरा है।
यह खेल खतरनाक है – क्योंकि जब पत्रकार डरने लगता है, तो जनता अंधी हो जाती है।
और जब जनता अंधी होती है, तो शासन निरंकुश हो जाता है।
पत्रकारिता का उद्देश्य ताली बजाना नहीं, सवाल उठाना है।
पर अब ऐसा लगता है कि सवाल करने वालों को “देशद्रोही” और “दुश्मन” घोषित करने का लाइसेंस भी कुछ अफसरों को मिल गया है।
छत्तीसगढ़ का मीडिया जगत इस वक्त दो हिस्सों में बँट चुका है –
एक वह जो डर में जी रहा है, और दूसरा जो डर दिखा रहा है।
जनसम्पर्क विभाग की यह भूमिका, जो कभी विश्वास का प्रतीक थी, अब भय का स्रोत बन गई है।
सरकारें आती-जाती रहती हैं, पर संस्थान की आत्मा हमेशा बची रहनी चाहिए।
अगर वही आत्मा मर जाए, तो केवल कुर्सियाँ बचती हैं और कुर्सियाँ कभी जनमत नहीं बना सकतीं।
अब सवाल यह नहीं कि “कौन गलत है”, सवाल यह है कि “कौन बचेगा?”
हर सरकार अपने आलोचक से डरती है, पर समझदार सरकारें उसी आलोचना से सीखती हैं।
आज समय है कि सत्ता यह समझे – विज्ञापन से इमेज नहीं बनती, इमेज विश्वास से बनती है।
जो आवाज़ें आज दबाई जा रही हैं, वे कल तूफ़ान बनेंगी।
जो कलमें आज रुकी हैं, वे कल इतिहास लिखेंगी।
और तब शायद यही लिखा जाएगा –
“जनसम्पर्क विभाग कभी जनता का था,
फिर किसी के चहेतों का हो गया,
और अंत में चुप्पी का।”

अंत में एक सवाल…
क्या यह वही छत्तीसगढ़ है, जहाँ संवाद सबसे बड़ा मूल्य था?
क्या यही वह शासन है जो जनता से भरोसे का रिश्ता बनाना चाहता था?
अगर हाँ, तो फिर पत्रकारों की आवाज़ क्यों डर में है? या क्यों दबाई जा रही है?
लोकतंत्र में सत्ता की ताकत नहीं, सवाल की आज़ादी ही सबसे बड़ी पूँजी होती है।
और जब सवाल पूछना अपराध बन जाए –
तो समझ लीजिए, सत्ता नहीं, लोकतंत्र खतरे में है।

  • यह सम्पादकीय शासन की आलोचना नहीं, चेतावनी है;
    क्योंकि जब संवाद मरता है, तो जनसम्पर्क नहीं, पूरा लोकतंत्र रोता है।

bulandmedia

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