जनसम्पर्क विभाग: ‘प्रचार’ का मंच या ‘विवाद’ का अखाड़ा?

सरकारी गलियारों से लेकर राजनीतिक चर्चाओं तक, अब एक ही सवाल –
रायपुर : छत्तीसगढ़ सरकार का जनसम्पर्क विभाग इन दिनों गलत वजहों से सुर्खियों में है। विभाग, जिसका उद्देश्य शासन की नीतियों और मुख्यमंत्री की छवि को सशक्त बनाना था, वहीं अब सवालों और विवादों का केंद्र बन चुका है। पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं – जनसम्पर्क आयुक्त डॉ. रवि मित्तल, जिनकी नियुक्ति को कभी “रणनीतिक और भरोसेमंद कदम” कहा गया था, लेकिन अब वही भरोसा सरकार के गले की फांस बनता दिख रहा है।

जनसम्पर्क विभाग की कमान उस समय डॉ. रवि मित्तल को सौंपी गई, जब विभाग में कई वरिष्ठ, अनुभवी और सक्षम अधिकारी पहले से मौजूद थे। इनमें तारन प्रकाश सिन्हा, दीपांशु काबरा, सोनमणि बोरा और सुकुमार टोप्पो जैसे अधिकारी शामिल हैं – जिनके पास न केवल अनुभव था, बल्कि विभागीय और जनसंपर्क की गहरी समझ भी। इन सभी को नजरअंदाज करते हुए एक जूनियर अधिकारी को शीर्ष पद पर बैठाना न केवल नौकरशाही की परंपराओं के विपरीत माना गया, बल्कि इसने प्रशासनिक असंतुलन भी पैदा कर दिया।
आज नतीजा सामने है – विभाग के भीतर ही दो धड़े स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। एक समूह जो “आदेश पालन” के नाम पर चुप है, और दूसरा जो खुलकर सवाल उठा रहा है कि “क्या सीनियर अफसरों की अनदेखी और अनुभव की उपेक्षा अब सरकार को भारी पड़ रही है?”
विभाग की दिशा और अनुशासन पर सवाल
जनसम्पर्क विभाग को सरकार और जनता के बीच संवाद का सेतु माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में यह सेतु “बेपटरी” होता नज़र आ रहा है। विभाग में विज्ञापन वितरण से लेकर फाइलों के निपटान तक अनुशासन की कमी और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
कई वरिष्ठ अधिकारी ऑफ रिकॉर्ड स्वीकार करते हैं कि विभाग में “पसंद-नापसंद की चकल्लस” हावी है। कुछ खास माध्यमों को विज्ञापन देकर बाकी को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे न केवल मीडिया जगत में असंतोष बढ़ा है, बल्कि सरकार की “निष्पक्षता की छवि” पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
किस दिशा में जाएगा जनसम्पर्क विभाग?
राज्य सरकार के लिए यह समय बेहद संवेदनशील है। छवि प्रबंधन के लिए जिम्मेदार विभाग यदि खुद ‘छवि संकट’ में फँस जाए, तो यह केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि रणनीतिक विफलता भी मानी जाएगी।
जनसम्पर्क का उद्देश्य संवाद, पारदर्शिता और जनविश्वास है – न कि भ्रम, असंतुलन और विवाद।
अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री इस स्थिति पर कितनी जल्दी और कितनी सख्ती से नियंत्रण करते हैं।
‘भरोसे का आदमी’ अब ‘विवादों का केंद्र’: सीएम की छवि हो रही खराब
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जिस भरोसे के साथ डॉ. मित्तल को आगे बढ़ाया था, वही भरोसा अब आलोचना का कारण बन गया है। सीएम की छवि सुधारने के बजाय विभागीय अफसरों की अदूरदर्शी कार्यशैली और विवादित निर्णयों ने सरकार की साख पर दाग लगाने का काम किया है। विज्ञापन नीति में असंतुलन, आदेशों का राजनीतिक इस्तेमाल और ‘अपनों को लाभ’ पहुंचाने की चर्चाएं अब खुले में हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि डॉ. मित्तल के कार्यकाल ने मुख्यमंत्री की छवि को चमकाने के बजाय धुंधला कर दिया है। “भरोसे के आदमी” की पहचान अब “विवादों के केंद्र” के रूप में बदलती जा रही है।
अंदरूनी असंतोष और प्रशासनिक विभाजन की आहट
जनसम्पर्क विभाग में इन दिनों माहौल सामान्य नहीं है। विभागीय निर्णयों को लेकर फैलती असहजता संकेत दे रही है कि विभाग के भीतर विश्वास की दरार गहरी होती जा रही है। प्रदेश के कई अनुभवी अधिकारी अब इस स्थिति को “अप्राकृतिक और खतरनाक” मान रहे हैं, क्योंकि जनसम्पर्क जैसी संवेदनशील इकाई में समन्वय का टूटना सीधे सरकार की नीति और जनता के भरोसे को प्रभावित करता है।
धारणा का संकट या एजेंडे का खेल: क्या कोई गुप्त एजेंडा चल रहा है?
राजनीतिक गलियारों में यह धारणा तेज़ी से फैल रही है कि डॉ. रवि मित्तल अपने मूल दायित्व से भटक चुके हैं। उनकी कार्यशैली न केवल विभाग की साख को कमजोर कर रही है, बल्कि मुख्यमंत्री की छवि पर भी चोट पहुँचा रही है।
कई सूत्रों का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि “रणनीतिक भ्रम” का नतीजा है – जिसके पीछे किसी गहरे ‘एजेंडे’ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक गलियारों में गूंजता सवाल: “क्या कोई गुप्त एजेंडा चल रहा है?”
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा धीरे-धीरे तेज़ हो रही है कि डॉ. मित्तल कहीं किसी अदृश्य एजेंडे के तहत तो काम नहीं कर रहे, जिसका उद्देश्य खुद मुख्यमंत्री को कमजोर करना हो। कई नेताओं का मानना है कि उनकी गतिविधियों और निर्णयों का प्रभाव मुख्यमंत्री की विश्वसनीयता पर प्रतिकूल पड़ रहा है। यही कारण है कि भाजपा संगठन और सरकार दोनों के भीतर अब यह विषय संवेदनशील रूप से देखा जा रहा है।अब निगाहें मुख्यमंत्री की ओर हैं – क्या वे इसे नज़रअंदाज़ करेंगे, या सख्त कार्रवाई का रास्ता चुनेंगे?
समीकरणों की उलझन और मुख्यमंत्री की मुश्किलें
सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय फिलहाल संतुलन बनाए रखने की कोशिश में हैं। लेकिन यह संतुलन दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। एक ओर विभागीय अनियमितताएं हैं, दूसरी ओर विपक्ष और मीडिया की तीखी आलोचना।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या अब मुख्यमंत्री को निर्णायक कदम उठाना चाहिए?
सरकार की छवि और भरोसे की लड़ाई अब केवल जनसम्पर्क विभाग के भीतर नहीं रह गई है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक साख से जुड़ चुकी है।







