गुरु पूर्णिमा हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह दिन गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है। इस पर्व से जुड़ी कुछ प्रमुख कथाएं और मान्यताएँ निम्नलिखित हैं:
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। वेदव्यास ने चारों वेदों को संहिताबद्ध किया, 18 पुराण, उपपुराण, महाभारत और श्रीमद्भागवत की रचना की।
Guru Purnima : कथा:
सत्यवती और महर्षि पराशर के पुत्र वेदव्यास ज्ञान के परम स्रोत माने जाते हैं। उन्होंने मानव कल्याण के लिए अपने ज्ञान को ग्रंथों के रूप में संरक्षित किया। इसलिए उन्हें “आदि गुरु” माना जाता है। उनके सम्मान में ही गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान शिव ने सप्तर्षियों को योग का पहला ज्ञान दिया था। वे पहले गुरु बने, इसलिए उन्हें “आदि गुरु” कहा गया। यह दिन योगिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है।
Guru Purnima : भगवान राम और गुरु वशिष्ठ
रामायण में वर्णन है कि श्रीराम के गुरु महर्षि वशिष्ठ थे। राम ने भी अपने जीवन में गुरु की आज्ञा का पूर्ण पालन किया। यह दिन हमें यह सिखाता है कि गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति और आत्मोन्नति संभव नहीं।
Guru Purnima : महात्मा बुद्ध और गुरु पूर्णिमा
बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा का विशेष स्थान है। इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ (वाराणसी) में अपने पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था और धम्मचक्र प्रवर्तन की शुरुआत की थी।
Guru Purnima : गुरु पूर्णिमा का महत्व
- यह दिन आत्म-विश्लेषण, साधना और गुरु के मार्गदर्शन में आत्मोन्नति का प्रतीक है।
- विद्यार्थी और साधक इस दिन अपने गुरु से आशीर्वाद लेते हैं।
- भारत में यह दिन शिक्षा, भक्ति और योग के अनुशासन की शुरुआत का समय माना जाता है।







